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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

क्या हमारा विश्वास इतना कमजोर है?

आज कल जहाँ देखो कभी बाबा लोग के चर्चे तो कभी धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के, कभी किसी ख़ास बात को लेकर हंगामा करते तो कभी किसी फ़िल्म में धर्म की विसंगतियों के आलोचना होने पर। ये कभी यह चर्चा न करेंगे की हमारे धर्म में यह गलत हो रहा है तो फ़िल्म ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया की लोगों के बीच फैला अंधविश्वास हटा रही है। इन्हें तो जैसे हमारे देवी-देवताओं ने सिर्फ हंगामा करने के लिए बनाया है। अब लोग कहेंगे कि बाबा को भी सिकुलर(sickular) नाम की बिमारी लग गयी है या बाबा ने भी कहीं धर्म परिवर्तन कर लिया होगा। खैर समझने दो जो उन्हें समझना हो।
हुआ यूँ कि बहुत दिनों से समाचार चैनलों में तो कभी समाचार पत्रों में जहाँ देखो एक ख़ास फ़िल्म को लेकर कुछ लोग हंगामा करते नजर आएँगे। जी हाँ, तो मैं बात कर रहा था फ़िल्म पी. के. की, जिसको लेकर कहीं सिनेमाघर तोड़े जा रहे तो कहीं पोस्टर फाड़े जा रहे तो कहीं उसमें कार्य करने वाले अभिनेता, अभिनेत्री इत्यादि की फ़ोटो जला रहे है। मगर इन तथाकथित ठेकेदारों को यह नहीं की एक बार फ़िल्म तो देख कर कुछ बोले, आखिर फ़िल्म में ऐसा है क्या जो वो इतने भड़के हुए है, उन्हें तो सिर्फ मतलब है समाचार चैनलों में कैसे सुर्खियाँ बने, उन्हें मतलब है सिर्फ इससे की वो कैसे आम जनता के बीच उनके एकमात्र शुभचिंतक बने।
मैं तो पूछना चाहता हूँ इन ठेकेदारों से क्या उनका धर्म इतना कमजोर है, क्या उनका विश्वास इतना कमजोर है जो एक फ़िल्म ने डिगा डाला, और यदि नहीं तो वो फ़िल्म को देखे फिर उसकी आलोचना करें। और जैसा मैंने आज देख कर पाया कि यह फ़िल्म हिन्दू धर्म के विसंगतियों के अलावा अन्य धर्म के विसंगतियों पर भी प्रहार करती नजर आ रही थी, मगर चूँकि हिन्दू एक बहुसंख्यक है तो उसकी विसंगतियाँ भी मुख्यतः दिखाई जाएगी। बल्कि हमें तो खुश होना चाहिए कि यह फ़िल्म हमारे रूढ़िवादियों के खिलाफ बोलती है, उन तथा कथित बाबा लोगों की पोल खोलते नजर आती है जो खुद तो ए सी में रहते, मगर अन्धविश्वासी भक्तों को परेशानियाँ झेलने को बोलते।
मैं सोचता था कि हमारे देश के दो स्वामी एक बाबा रामदेव एवं दूसरे सुब्रमण्यम स्वामी कम से कम कुछ न बोलेंगे और यदि बोलेंगे भी तो सोच समझकर और सही बोलेंगे और इन तथाकथित ठेकेदारों का समर्थन न करेंगे, मगर मालुम न उन्हें भी क्या हुआ कि वो भी बहती मझधार में हाथ धोने चले गए।
शायद इन लोगों को एक वहं हो चला है जैसे जनता हमेशा उन्हीं का पक्ष लेगी, मगर उन्हें यह भी याद रखना चाहिए ये जनता सर पर उठाना तो जानती ही है मगर उतारना भी इसे अच्छी तरह आता है, कहीं ऐसा न हो जाये की जनता उनकी सुनना भी छोड़ दे, शायद रामदेव जी को याद भी रहना चाहिए जो जनता आपके योग के कारण आपको सर आँखों पे बिठाए रखती थी उसे ही आपका नेता की तरह बोलना भी पसंद न था।
अभी भी समय है इन तथाकथित नेताओं के पास कि वो संभल जाएँ अन्यथा जनता भी समय का इन्तेजार ही करती है। जरुरी है इनके लिए कि वो विकास और धर्म में घुस आयीं तमाम विसंगतियों को दूर करने का प्रयास करें न कि उन विसंगतियों के खिलाफ बोलने वाले को दूर करने का प्रयास करें।

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