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मंगलवार, 6 जनवरी 2015

सब्सिडी : एक सुनहरा ख्वाब गरीबों का

सब्सिडी एक ऐसा शब्द जिसका जिक्र होते ही आँखों के सामने सरकार की विभिन्न योजनायें चलने लगती जिसे गरीबों के लिए बनाया गया है। ऐसी योजना जिससे गरीब लाभान्वित होकर अपने जीवन स्तर को आगे बढ़ाने की सोच सकते। लेकिन कहा जाता है कि दूर का ढोल ज्यादा ही सुहावना होता है, उसी प्रकार हमारी सरकार की सब्सिडी वाली योजनाएं भी दूर के ढोल की भाँति ही नजर आती।
जमीन पर जा कर देखने पर समझ आता जिन्हें सब्सिडी मिलनी चाहिए उन्हें तो सब्सिडी का abcd भी नहीं दिखता, उन्हें दिखाएँ जाते है चुनाव पूर्व सपनों की लड़ी। आज कृषि से लेकर रोजगार जहाँ देखे सब्सिडी सिर्फ बड़े लोगों के लिए बनी हुई दिखाई पड़ती। कृषि में देखों तो हमारे सीमांत और भूमिहीन किसानों के नाम पर तो सब्सिडी संबंधी कई योजनाएँ दिखाई तो देती मगर हकीकत में उन्हें उस सब्सिडी का एक कतरा भी नहीं मिल पाता, चाहे वो बीज वितरण हो या चाहे कृषि संबंधी उपस्करों की खरीद, प्रत्येक जगह सिर्फ मध्यम या बड़े किसान ही दिखते जो सब्सिडी का फायदा भी उठाते और अधिकतम मुनाफा कमा लेते। मगर वह छोटा किसान बाजार से बीज खरीदने के लिए बेबस है क्योंकि सरकार द्वारा दिए जाने वाले बीज के हिसाब से न उसके पास खेत है ना ही उपस्करों को खरीदने के लिए वो पैसे जिसका वो बाद में सब्सिडी ले सके।
यह किसान तो बेबस है बाजार के भाव से अपने बीज खरीदने को और बाजार के भाव से उपस्करों को भाड़े पर प्रयोग करने को या बाजार के मजदुर को खेती में प्रयोग करने को, और इन सब के बाद आती है उत्पादन करने के बाद उसे बेचने की बारी। वो उन बड़े किसानों की तरह तो है नहीं जो पैक्स जैसी सरकारी संस्था में बेच सके, न ही इतना बड़ा की वो बड़े शहरों के बाजार में इतने उत्पादन लागत के बावजूद वो अपने उत्पाद बेच सके। वो तो बिना किसी सब्सिडी के खेती करता और अपना उत्पाद भी औने-पौने भाव पर बनिया या नजदीकी बाजार में बेच आता। उसके हाथ आते तो कुछ रेवड़ियाँ जो उसके जीवन यापन के लिए नाकाफी होते होते। वहीँ बड़े किसान सब्सिडी, बड़े शहरों के बाजार, सरकारी एजेंसियों तक पहुँच हरेक जगह फायदे ही लेता फिरता है। हमें शुरू से यहीं सिखाया जाता रहा है यदि सब्सिडी नहीं रहे तो सामान महंगे हो जाएंगे तो हमारे असंख्य छोटे किसानों का क्या जो इनसे प्रतियोगिता भी नहीं रख पाते, आखिर ये कौन सा सरकारी न्याय है जो गरीबों के लिए नहीं बल्कि बड़ों के लिए हैं।
और यह तो सिर्फ इस सब्सिडी का एकमात्र पहलु है जो हमारे कृषि क्षेत्र से सम्बंधित है, ऐसा तो हरेक क्षेत्र में होता रहा है किसी व्यवसाय से लेकर उद्योग तक। एक तरफ जहाँ छोटे व्यवसायी को सरकार ऋण उच्च ब्याज दर पर देती है, वहीँ बड़े व्यवसायियों को कम दरों पर। एक तरफ जहाँ लघु उद्योग जगह की कमी, पूंजी की कमी, सरकारी मदद की कमी इत्यादि से खत्म हो रहे वहीँ सरकार बड़े उद्योगपतियों को कम ब्याज दर पर पूंजी, कच्चे माल से लिंकेज, कम दर पर ईंधन इत्यादि सुविधा देते रहती है। शायद भारत की यह एक ऐसी कहानी है जिसका जिम्मेदार कोई एक ख़ास पार्टी या नेता नहीं है बल्कि वो सारे पार्टी है जो इसी तर्ज पर आगे बढ़ रही है जिन्हें छोटे लोगों को तो सहायता देना ख़राब लगता मगर बड़े लोगों को थोड़ा नुकसान होने पर उसकी भरपाई की भी आम जनता के पैसे से गारंटी देता।
शायद देश की अधिकतर जनता काम तो करती है मगर किसी और के लिए, शायद किसी उद्योगपति के लिए, शायद हममें गुलामी की जंजीर इतनी कड़ी बाँधी गयी थी जिससे अभी भी दूर न निकल पाये है। मेरा तो भैया सिर्फ इतना ही कहना है कि सब्सिडी शब्द ही हमारा ज्यादा नुकसान करती आ रही जिसके बहाने सरकारें सिर्फ बड़ों को फायदा पहुंचाते जाती वही छोटों पर अपनी जान की भी आफत बन आई रहती।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

क्या हमारा विश्वास इतना कमजोर है?

आज कल जहाँ देखो कभी बाबा लोग के चर्चे तो कभी धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के, कभी किसी ख़ास बात को लेकर हंगामा करते तो कभी किसी फ़िल्म में धर्म की विसंगतियों के आलोचना होने पर। ये कभी यह चर्चा न करेंगे की हमारे धर्म में यह गलत हो रहा है तो फ़िल्म ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया की लोगों के बीच फैला अंधविश्वास हटा रही है। इन्हें तो जैसे हमारे देवी-देवताओं ने सिर्फ हंगामा करने के लिए बनाया है। अब लोग कहेंगे कि बाबा को भी सिकुलर(sickular) नाम की बिमारी लग गयी है या बाबा ने भी कहीं धर्म परिवर्तन कर लिया होगा। खैर समझने दो जो उन्हें समझना हो।
हुआ यूँ कि बहुत दिनों से समाचार चैनलों में तो कभी समाचार पत्रों में जहाँ देखो एक ख़ास फ़िल्म को लेकर कुछ लोग हंगामा करते नजर आएँगे। जी हाँ, तो मैं बात कर रहा था फ़िल्म पी. के. की, जिसको लेकर कहीं सिनेमाघर तोड़े जा रहे तो कहीं पोस्टर फाड़े जा रहे तो कहीं उसमें कार्य करने वाले अभिनेता, अभिनेत्री इत्यादि की फ़ोटो जला रहे है। मगर इन तथाकथित ठेकेदारों को यह नहीं की एक बार फ़िल्म तो देख कर कुछ बोले, आखिर फ़िल्म में ऐसा है क्या जो वो इतने भड़के हुए है, उन्हें तो सिर्फ मतलब है समाचार चैनलों में कैसे सुर्खियाँ बने, उन्हें मतलब है सिर्फ इससे की वो कैसे आम जनता के बीच उनके एकमात्र शुभचिंतक बने।
मैं तो पूछना चाहता हूँ इन ठेकेदारों से क्या उनका धर्म इतना कमजोर है, क्या उनका विश्वास इतना कमजोर है जो एक फ़िल्म ने डिगा डाला, और यदि नहीं तो वो फ़िल्म को देखे फिर उसकी आलोचना करें। और जैसा मैंने आज देख कर पाया कि यह फ़िल्म हिन्दू धर्म के विसंगतियों के अलावा अन्य धर्म के विसंगतियों पर भी प्रहार करती नजर आ रही थी, मगर चूँकि हिन्दू एक बहुसंख्यक है तो उसकी विसंगतियाँ भी मुख्यतः दिखाई जाएगी। बल्कि हमें तो खुश होना चाहिए कि यह फ़िल्म हमारे रूढ़िवादियों के खिलाफ बोलती है, उन तथा कथित बाबा लोगों की पोल खोलते नजर आती है जो खुद तो ए सी में रहते, मगर अन्धविश्वासी भक्तों को परेशानियाँ झेलने को बोलते।
मैं सोचता था कि हमारे देश के दो स्वामी एक बाबा रामदेव एवं दूसरे सुब्रमण्यम स्वामी कम से कम कुछ न बोलेंगे और यदि बोलेंगे भी तो सोच समझकर और सही बोलेंगे और इन तथाकथित ठेकेदारों का समर्थन न करेंगे, मगर मालुम न उन्हें भी क्या हुआ कि वो भी बहती मझधार में हाथ धोने चले गए।
शायद इन लोगों को एक वहं हो चला है जैसे जनता हमेशा उन्हीं का पक्ष लेगी, मगर उन्हें यह भी याद रखना चाहिए ये जनता सर पर उठाना तो जानती ही है मगर उतारना भी इसे अच्छी तरह आता है, कहीं ऐसा न हो जाये की जनता उनकी सुनना भी छोड़ दे, शायद रामदेव जी को याद भी रहना चाहिए जो जनता आपके योग के कारण आपको सर आँखों पे बिठाए रखती थी उसे ही आपका नेता की तरह बोलना भी पसंद न था।
अभी भी समय है इन तथाकथित नेताओं के पास कि वो संभल जाएँ अन्यथा जनता भी समय का इन्तेजार ही करती है। जरुरी है इनके लिए कि वो विकास और धर्म में घुस आयीं तमाम विसंगतियों को दूर करने का प्रयास करें न कि उन विसंगतियों के खिलाफ बोलने वाले को दूर करने का प्रयास करें।