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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

धार्मिक स्थल, उसका निर्माण और प्राचीन अवधारणाएँ...

आज कल के समाचार में मंदिरों में व्याप्त भ्रस्टाचार बहुत ही प्रमुखता से भारत के प्रमुख खबरिया चैनलों ने दिखाई। और समय के साथ मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले दान पर भी चर्चा बहुत ही जरुरी थी। आखिर ऐसा क्यों हो गया कि मंदिरों में आज-कल इतना भ्रष्टाचार व्याप्त है, भगवान को भी इन मंदिरों में न छोड़ा गया।
मगर अंत में सबसे अजीबों गरीब बात इस देश की लोकतंत्र के तरह बुराई तो सभी कर लेते मगर कोई भी उस समस्या का समाधान नहीं बताता। तो आइये जाने इतिहास इस दान के बारे में क्या कहता है?

अगर हम प्राचीन वेद, धर्म ग्रन्थ जैसे कि महाभारत, रामायण या गीता इत्यादि को ध्यान से पढ़े तो एक बात सर्वतया है कि उस समय मंदिर का कोई सिद्धांत न था। हाँ ब्राह्मण वर्ग उस समय हुआ करता था, मगर आज के जाति व्यवस्था आधारित नहीं वरन् वर्ण व्यवस्था आधारित जिनको उस समय के समाज में विद्वान, आचार्य इत्यादि कि संज्ञा प्राप्त थी। ये ब्राह्मण राज्य के सलाहकार भी होते थे। इन ब्राह्मणों का कार्य शिक्षा प्रदान करना, चिकित्सा व्यवस्था को देखना इत्यादि हुआ करता था।  यह सभी कार्य गुरुकुल, आश्रम
इत्यादि जगह पर हुआ करते थे।
इन समाज के कल्याण वाली संस्थाओं को चलाने के लिए दान की व्यवस्था होती थी। जिसे उस राज्य का हरेक प्रजा ही नहीं बल्कि राजपरिवार भी मानता था। उस समय यह दान उस व्यवस्था को चलाने के लिए होती थी जिसके अंतर्गत सबको समान शिक्षा का अधिकार, जीवनोपयोगी रोजगार आधारित शिक्षा, समान चिकित्सा व्यवस्था इत्यादि प्राप्त थी। इसमें गुरुकुल में जिस अवस्था में एक गरीब प्रजा के बच्चे रहते थे उसी अवस्था में राजपरिवार के बच्चे भी। कहीं पर दिखावा न होता था। कई जगह तो यह भी व्यवस्था थी की राजकुमारों को उनके नाम से कोई न जाने जिससे सभी समान रूप से उस गुरुकुल में रहे।
ब्राह्मणों के निवास स्थल भी चूंकि उन्हीं आश्रम और गुरुकुल में हुआ करते थे, और वो अपना समय इन जनहितकारी कार्यों में गुजारते थे तो यह दान उनके छात्रों, गुरुकुल के आचार्यों, कर्मचारियों इत्यादि पर खर्च की जाती थी।
मगर समय के साथ हमारी व्यवस्था प्रणाली में इतने गंभीर घाव किए जाने लगे जिसके कारण जाति-व्यवस्था का आगमन हुआ और फिर चालू हुआ धर्म के नाम पर धार्मिक स्थलों का निर्माण। जिसका कोई वास्तविक उपयोग अभी तक नजर नहीं आता दिख रहा सिवा इस बात के की उस धार्मिक स्थलों के बाहर आज के पंडितों की भीड़ सी नजर आती है जो धर्म के नाम पर आए उन मंदिरों में आए लोगों पर टूट पड़ते है। हरेक जगह दान-पात्र नजर आता मगर उसका कोई सुखद उपयोग नजर नहीं आता। मंदिरों के खजाने भरे जा रहे मगर उसका उपयोग कैसे हो वो कोई न जानता। न आम जनता इस पर कोई सवाल खड़े करती है न अपने कमाई के हिस्से का उपयोग देखती है। वो बस अंध-भक्ति में दान किए चली जाती है, भले ही उन पैसों को मंदिर में स्थापित कुछ पंडित कुछ भी कर रहे हो, कोई उसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेता।
मैं ऐसा न कह रहा कि सारे मंदिर खराब है, इन सब में सबसे आगे बढ़ कर आया एक मंदिर बिहार की राजधानी पटना का हनुमान मंदिर है जो इस दान के पैसे का उपयोग लोगों की कम दर पर चिकित्सा में कर रहा। मगर ऐसे तो बिरले ही मिलेंगे।
आज जरूरत है हमारे धर्म के लोगों को मंदिर की व्यवस्था समझने की और अपने पैसों के सदुपयोग की। क्या हम जो दान मंदिर में कर रहे क्या वो सुरक्षित हाथों में है या उस पैसे का सदुपयोग जन कल्याण में हो रहा या सिर्फ कुछ न्यासी और पंडितों के परिवार के पेट-पूजन के लिए हो रहा।
पैसा आपका है, हम तो सिर्फ यही कहेंगे पुराने समय की तरह जब मंदिर नहीं हुआ करते थे, अपने घर में भगवान की व्यवस्था कीजिये उन पर कुछ समर्पित कीजिये और साल के अंत में किसी गरीब के कल्याण में उस अर्जित रकम को लगा दीजिये। इस तरह मालूम न कितनों का भला हो जाए। हम पुनः गुरुकुल की व्यवस्था तो नहीं कर सकते मगर एक गरीब को जरूर पढ़ा सकते या उसका इलाज करा सकते है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

आर्य समाज और उसकी घटती प्रासंगिकता

पिछले 3-4 महीने से भारत में बहुत सारे विवाह हो चुके या हो रहे हैं। यदि एक नजर दौड़ाये तो हमारे यहाँ हिन्दू समाज में विवाह के दो तरीके प्रचलित है: 1. सनातन विधि 2. आर्य समाज विधि।
कई बार सुनने को आता कि कई शिक्षित लोग कहते की आर्य समाज बेहतर है तो कोई कहता की सनातन। आज देखिये तो हिन्दू वर्ग भी संशय में नजर आता कि सनातन बेहतर या आर्य समाज। फलस्वरूप कई घरों में तो जरुरत के हिसाब से पूजन की दोनों ही विधियाँ प्रयोग में लायी जाती है। मगर फिर भी विवाह में अधिकतर जगह सनातन विधि ही नजर आती यहाँ तक कि जिन घरों में मुख्य पूजन के लिए आर्य समाज विधि प्रयोग की जाती रही हैं वो घर भी अब सनातन विधि की तरफ रुख कर रहे हैं। सही मायनों में देखे तो आज के समय में आर्य समाज पद्धति भी उसी जगह पर जाता दिख रहा जहाँ सनातन पूजन विधि है।
यदि हम इतिहास के पन्नों की तरफ रुख करे तो पाएंगे कि समय के साथ सनातन विधि के वेद से विमुखता, गलत नियमों और पंडितों के ढोंग इत्यादि को ख़त्म करने के लिहाज से आर्य समाज का गठन हुआ था, जिसको वेद आधारित बनाया गया। इसके अलावा इसमें तत्कालीन समाज में व्याप अन्य बुराइयों जैसे की मुख्यतः दहेज़ प्रथा, पर्दा प्रथा इत्यादि के भी खिलाफ तैयार किया गया। कुछ समय तो इसके विद्वानों के कारण काफी विकास भी होता रहा, जो धीरे धीरे समाज में एक बदलाव का प्रतीक चिन्ह भी बनते गयी। कुछ हद तक आर्य समाज ने हिन्दू समाज की बहुत सारी कुरीतियों को दूर करने के लिए बहुत अच्छा भूमिका भी निभाया। मगर यह सर्वविदित है कि जब बच्चे छोटे होते है तो वो बहुत निर्दोष होते हैं, उनमें छल कपट जैसी कोई भी बात न होती न कोई बुराइयाँ। मगर समय के साथ उन मासूम बच्चों में बुराइयाँ भी आती जाती। ठीक उसी प्रकार आर्य समाज पद्धति में भी सनातन धर्म वाली बुराइयाँ घर करने लगी। जैसे सनातन धर्म के जिन कुरीतियों को ख़त्म करने के लिए यह पद्धति बनायीं गयी वो कुरीतियाँ अब इस पद्धति में भी नजर आने लगी है जैसे - जिस पाखण्ड और ढोंग के खिलाफ इस पद्धति ने जन्म लिया आज वो ढोंग और पाखण्ड इस पद्धति में भी नजर आने लगी है।
जहाँ अपेक्षा की गयी थी की इसके विद्वान सामान्य तरीके से अपनी जिंदगी का गुजर बसर करेंगे वो इस पद्धति को जीवन-यापन का तरीका बनाने में लगे हुए है जिसके कारण आज भी इस पद्धति में पूजन कराने वाले आज यजमान से अधिकतम दक्षिणा या सामग्री की मांग करते है।
जहाँ यह अपेक्षा की गयी थी की इस पद्धति में कोई भी पूजा करा सकता है वहाँ यह पद्धति भी आज के समय में पुरोहित-प्रधान होते जा रही है।
जहाँ पूजन पद्धति में एक समानता होनी चाहिए वहाँ आज किसी आर्य समाज से सम्बन्ध रखने वाले किसी पुरोहित को एक प्रकार की पूजन दो भिन्न जगह पर कराने के लिए बोल दीजिये तो उनके पूजा कराने का तरीका तक बदल जाता जैसे लगता की पूजन पद्धति उन्हीं के द्वारा बनाया गया हो।
जहाँ समाज को अपेक्षा थी कि इसके माध्यम से दहेज़ प्रथा खत्म होगी मगर आज इस पद्धति में भी विश्वास करने वाले खुले आम दहेज़ की मांग रखते है।
धीरे धीरे तो यह पूजन पद्धति तो लगता कि आज मुख्यतः उन्हीं के काम आती जो प्रेम विवाह करते या फिर कम समय में पूजन कार्य को निपटाना चाहते। सिर्फ इतना ही नहीं कुछ जगह तो आर्य समाज पद्धति इस लिए भी प्रयोग लायी जा रही की फिल्मों में उसका चित्रांकन बहुत अच्छे से किया जाता और उससे वो प्रेरित हो जाते।
एक तरह से देखे तो आज आर्य समाज से जुड़े लोगों को पुनः अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए कि जो वो कर रहे क्या वो सही है, क्या इस पद्धति को जन्म देने वाले महापुरुष ने आपसे यही अपेक्षा की थी। क्या आप सच में आर्य समाज के वेद आधारित पूजन का विकास करना चाहते है? आज जरुरत है एक पुनर्मन्थन की जिससे इस पद्धति को वो दिशा दी जा सके जो इसे कुछ समय के लिए सबका ख़ास बना दिया था,आज जरुरत है एक बदलाव की जिससे कहीं ऐसा न हो जाए की इसके प्रणेता द्वारा बनायीं गयी यह पद्धति इतिहास के पन्नों में दर्ज न हो जाए।

(नोट: लेखक एक आर्य समाज आधारित परिवार से है जहाँ उसके परिवार के लोग भी आर्य समाज पद्धति से पूजन कार्य वगैरह संपन्न कराते रहे हैं।)

रविवार, 1 मार्च 2015

बेतिया शहर और दुर्दशा

बाबा जी फिर से हाजिर है, वैसे बाबा जी तो घुम्मकड़ किस्म के इंसान है, मगर बहुत दिनों बाद उन्हें बेतिया रहने का मौका मिला। बाबा जी अपने बचपन में हमेशा बेतिया आते-जाते रहे है। आज उसी बेतिया के बारे में बाबा जी न लिखे तो यह तो बेईमानी ही हुई न। अंततः बाबा जी को आज मौका मिल रहा इस शहर के बारे में भी लिखने को। तो आइये जाने बाबा जी से आज के बेतिया के बारे में।
बेतिया, अपने राजघराने और अन्य इतिहास के लिए जाना माना शहर। आज खुद अपनी पहचान को मोहताज है। बहुत दिन बाद इस शहर में रुका तो शहर की पुरानी फिजा ही बदली-बदली सी लगी। यह शहर हमेशा से एक ख़ास रहा अपने इतिहास और अपनी मौजूदा गलियों के कारण जो आपको शहर के बीचों-बीच मौजूद दो मुख्य सड़कों को कई जगहों से जोड़ते हुए राहगीर के कार्य को आसान कर देती है। मगर इस बार ऐसा लगा जैसे लोग बेतिया के इस पहचान को खत्म कर देना चाहते है। एक तो सांस्कृतिक महत्त्व के स्थानों पर पुरे शहर से जमा किये गए कूड़े-कचरे का ढेर और दूसरा सड़क पर लगने वाला जाम। शायद यहाँ की जनता को यह न मालूम है कि आज कल के उनके वारिस जो किसी बड़े शहर में रहती है, वो इसे नापसंद करेंगी और हालात ऐसे हो जाएंगे कि वो यहाँ शायद आना भी पसंद न करे, आखिर शहर की पहचान माने जाने वाले जगहों पर कूड़ा कचरा और जाम कौन पसंद करेगा।
खैर जनता तो रही जनता हमारी सरकारी महकमा भी कुछ इसी तरह का है। जहाँ इनका काम शहर की व्यवस्था को देखना है, वहाँ मालुम ना वो कहाँ गायब दिखते है। जिस सरकारी महकमा का काम शहर के कचरों का निस्तारण करना है, वो सार्वजनिक जगह को कचरा बना रही है चाहे वो राज देवड़ी के पास का पार्क हो या प्रत्येक साल मेला लगने की जगह या फिर राज देवड़ी होकर बाजार जाने का रास्ता या फिर बेतिया का रमना मैदान। इसी प्रकार यदि प्रशासन की बात करे तो जहाँ पुलिस विभाग के दुरुस्त जवानों की जरुरत है वहाँ कुछ रिटायरमेंट के नजदीक पहुंचे बुजुर्ग सिपाहियों को कार्य दे दिया जाता है वो भी कम संख्या में। जहाँ ट्रैफिक के नियमों का पालन कराने के लिए पुलिस जीप को व्यस्त रोड पर खड़ा होना चाहिए तो वो पुलिस जीप शहर के सबसे शांत इलाकों में घूमती नजर आती है। किसी से सुना यहाँ के एस. पी. साहब बहुत अच्छे है मगर ट्रैफिक के हालातों को देखते हुए लगता नहीं की वो कभी अपने सरकारी आवास या दफ्तर से भी बाहर निकलते होंगे, अन्यथा सड़कों पर ट्रैफिक के सामान्य नियमों जैसे बिना हेलमेट पहने मोटर साइकिल चालाक, बिना जूते के मोटर साइकिल चलाते लोग, उच्च रफ़्तार में सड़क पर मोटर साइकिल चलाते हमारे समझदार नए जमाने के कम आयु में ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त नवयुवक नजर न आते।
सिर्फ इतना ही नहीं, शायद बेतिया के प्रशासनिक अधिकारी शहर में लगे जाम को समझे तो उन्हें समझ में आएगा की एक मार्ग वाले ट्रैफिक व्यवस्था की यहाँ सख्त जरुरत है मगर शायद ही कोई अधिकारी यह दिमाग लगाएँ की इस गलियोँ वाले सड़क पर ये कैसे संभव होगा, जरुरत है तो यहाँ के प्रशासन को खुद से कुछ सालाहकार जोड़ने की जो किसी तथाकथित उच्च वर्ग से न होकर उस शिक्षित वर्ग से हो जो शहर के लिए कुछ करना चाहते हो या उसका भला चाहते हो और उससे सम्बंधित सलाहकार की भूमिका में आ सके अन्यथा तथाकथित मारवाड़ी समाज हो या व्यापारी समाज सबने खुद के बारे में ही सोचा है, शहर के बारे में कभी नहीं।
जरूरत हैं आज की शहर के कॉलेज और अन्य प्रशिक्षण संस्थानों के लोगों और अन्य शहरों में रहने वाले युवाओं तक पहुँचने की क्युँकि आज की पीढ़ी कुछ कार्य करना चाहती है, जिससे सबका भला हो सके, हमारे शहर का भला हो सके जिससे वो अपनी पहचान बनाएँ रख सके।
कुछ सुझाव इस बाबा के मन में भी है, मगर सुझाव तो बाबा तभी दे पाएंगे जब हमारे सरकारी अधिकारी उस पर अमल करना चाहे।

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

सब्सिडी : एक सुनहरा ख्वाब गरीबों का

सब्सिडी एक ऐसा शब्द जिसका जिक्र होते ही आँखों के सामने सरकार की विभिन्न योजनायें चलने लगती जिसे गरीबों के लिए बनाया गया है। ऐसी योजना जिससे गरीब लाभान्वित होकर अपने जीवन स्तर को आगे बढ़ाने की सोच सकते। लेकिन कहा जाता है कि दूर का ढोल ज्यादा ही सुहावना होता है, उसी प्रकार हमारी सरकार की सब्सिडी वाली योजनाएं भी दूर के ढोल की भाँति ही नजर आती।
जमीन पर जा कर देखने पर समझ आता जिन्हें सब्सिडी मिलनी चाहिए उन्हें तो सब्सिडी का abcd भी नहीं दिखता, उन्हें दिखाएँ जाते है चुनाव पूर्व सपनों की लड़ी। आज कृषि से लेकर रोजगार जहाँ देखे सब्सिडी सिर्फ बड़े लोगों के लिए बनी हुई दिखाई पड़ती। कृषि में देखों तो हमारे सीमांत और भूमिहीन किसानों के नाम पर तो सब्सिडी संबंधी कई योजनाएँ दिखाई तो देती मगर हकीकत में उन्हें उस सब्सिडी का एक कतरा भी नहीं मिल पाता, चाहे वो बीज वितरण हो या चाहे कृषि संबंधी उपस्करों की खरीद, प्रत्येक जगह सिर्फ मध्यम या बड़े किसान ही दिखते जो सब्सिडी का फायदा भी उठाते और अधिकतम मुनाफा कमा लेते। मगर वह छोटा किसान बाजार से बीज खरीदने के लिए बेबस है क्योंकि सरकार द्वारा दिए जाने वाले बीज के हिसाब से न उसके पास खेत है ना ही उपस्करों को खरीदने के लिए वो पैसे जिसका वो बाद में सब्सिडी ले सके।
यह किसान तो बेबस है बाजार के भाव से अपने बीज खरीदने को और बाजार के भाव से उपस्करों को भाड़े पर प्रयोग करने को या बाजार के मजदुर को खेती में प्रयोग करने को, और इन सब के बाद आती है उत्पादन करने के बाद उसे बेचने की बारी। वो उन बड़े किसानों की तरह तो है नहीं जो पैक्स जैसी सरकारी संस्था में बेच सके, न ही इतना बड़ा की वो बड़े शहरों के बाजार में इतने उत्पादन लागत के बावजूद वो अपने उत्पाद बेच सके। वो तो बिना किसी सब्सिडी के खेती करता और अपना उत्पाद भी औने-पौने भाव पर बनिया या नजदीकी बाजार में बेच आता। उसके हाथ आते तो कुछ रेवड़ियाँ जो उसके जीवन यापन के लिए नाकाफी होते होते। वहीँ बड़े किसान सब्सिडी, बड़े शहरों के बाजार, सरकारी एजेंसियों तक पहुँच हरेक जगह फायदे ही लेता फिरता है। हमें शुरू से यहीं सिखाया जाता रहा है यदि सब्सिडी नहीं रहे तो सामान महंगे हो जाएंगे तो हमारे असंख्य छोटे किसानों का क्या जो इनसे प्रतियोगिता भी नहीं रख पाते, आखिर ये कौन सा सरकारी न्याय है जो गरीबों के लिए नहीं बल्कि बड़ों के लिए हैं।
और यह तो सिर्फ इस सब्सिडी का एकमात्र पहलु है जो हमारे कृषि क्षेत्र से सम्बंधित है, ऐसा तो हरेक क्षेत्र में होता रहा है किसी व्यवसाय से लेकर उद्योग तक। एक तरफ जहाँ छोटे व्यवसायी को सरकार ऋण उच्च ब्याज दर पर देती है, वहीँ बड़े व्यवसायियों को कम दरों पर। एक तरफ जहाँ लघु उद्योग जगह की कमी, पूंजी की कमी, सरकारी मदद की कमी इत्यादि से खत्म हो रहे वहीँ सरकार बड़े उद्योगपतियों को कम ब्याज दर पर पूंजी, कच्चे माल से लिंकेज, कम दर पर ईंधन इत्यादि सुविधा देते रहती है। शायद भारत की यह एक ऐसी कहानी है जिसका जिम्मेदार कोई एक ख़ास पार्टी या नेता नहीं है बल्कि वो सारे पार्टी है जो इसी तर्ज पर आगे बढ़ रही है जिन्हें छोटे लोगों को तो सहायता देना ख़राब लगता मगर बड़े लोगों को थोड़ा नुकसान होने पर उसकी भरपाई की भी आम जनता के पैसे से गारंटी देता।
शायद देश की अधिकतर जनता काम तो करती है मगर किसी और के लिए, शायद किसी उद्योगपति के लिए, शायद हममें गुलामी की जंजीर इतनी कड़ी बाँधी गयी थी जिससे अभी भी दूर न निकल पाये है। मेरा तो भैया सिर्फ इतना ही कहना है कि सब्सिडी शब्द ही हमारा ज्यादा नुकसान करती आ रही जिसके बहाने सरकारें सिर्फ बड़ों को फायदा पहुंचाते जाती वही छोटों पर अपनी जान की भी आफत बन आई रहती।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

क्या हमारा विश्वास इतना कमजोर है?

आज कल जहाँ देखो कभी बाबा लोग के चर्चे तो कभी धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के, कभी किसी ख़ास बात को लेकर हंगामा करते तो कभी किसी फ़िल्म में धर्म की विसंगतियों के आलोचना होने पर। ये कभी यह चर्चा न करेंगे की हमारे धर्म में यह गलत हो रहा है तो फ़िल्म ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया की लोगों के बीच फैला अंधविश्वास हटा रही है। इन्हें तो जैसे हमारे देवी-देवताओं ने सिर्फ हंगामा करने के लिए बनाया है। अब लोग कहेंगे कि बाबा को भी सिकुलर(sickular) नाम की बिमारी लग गयी है या बाबा ने भी कहीं धर्म परिवर्तन कर लिया होगा। खैर समझने दो जो उन्हें समझना हो।
हुआ यूँ कि बहुत दिनों से समाचार चैनलों में तो कभी समाचार पत्रों में जहाँ देखो एक ख़ास फ़िल्म को लेकर कुछ लोग हंगामा करते नजर आएँगे। जी हाँ, तो मैं बात कर रहा था फ़िल्म पी. के. की, जिसको लेकर कहीं सिनेमाघर तोड़े जा रहे तो कहीं पोस्टर फाड़े जा रहे तो कहीं उसमें कार्य करने वाले अभिनेता, अभिनेत्री इत्यादि की फ़ोटो जला रहे है। मगर इन तथाकथित ठेकेदारों को यह नहीं की एक बार फ़िल्म तो देख कर कुछ बोले, आखिर फ़िल्म में ऐसा है क्या जो वो इतने भड़के हुए है, उन्हें तो सिर्फ मतलब है समाचार चैनलों में कैसे सुर्खियाँ बने, उन्हें मतलब है सिर्फ इससे की वो कैसे आम जनता के बीच उनके एकमात्र शुभचिंतक बने।
मैं तो पूछना चाहता हूँ इन ठेकेदारों से क्या उनका धर्म इतना कमजोर है, क्या उनका विश्वास इतना कमजोर है जो एक फ़िल्म ने डिगा डाला, और यदि नहीं तो वो फ़िल्म को देखे फिर उसकी आलोचना करें। और जैसा मैंने आज देख कर पाया कि यह फ़िल्म हिन्दू धर्म के विसंगतियों के अलावा अन्य धर्म के विसंगतियों पर भी प्रहार करती नजर आ रही थी, मगर चूँकि हिन्दू एक बहुसंख्यक है तो उसकी विसंगतियाँ भी मुख्यतः दिखाई जाएगी। बल्कि हमें तो खुश होना चाहिए कि यह फ़िल्म हमारे रूढ़िवादियों के खिलाफ बोलती है, उन तथा कथित बाबा लोगों की पोल खोलते नजर आती है जो खुद तो ए सी में रहते, मगर अन्धविश्वासी भक्तों को परेशानियाँ झेलने को बोलते।
मैं सोचता था कि हमारे देश के दो स्वामी एक बाबा रामदेव एवं दूसरे सुब्रमण्यम स्वामी कम से कम कुछ न बोलेंगे और यदि बोलेंगे भी तो सोच समझकर और सही बोलेंगे और इन तथाकथित ठेकेदारों का समर्थन न करेंगे, मगर मालुम न उन्हें भी क्या हुआ कि वो भी बहती मझधार में हाथ धोने चले गए।
शायद इन लोगों को एक वहं हो चला है जैसे जनता हमेशा उन्हीं का पक्ष लेगी, मगर उन्हें यह भी याद रखना चाहिए ये जनता सर पर उठाना तो जानती ही है मगर उतारना भी इसे अच्छी तरह आता है, कहीं ऐसा न हो जाये की जनता उनकी सुनना भी छोड़ दे, शायद रामदेव जी को याद भी रहना चाहिए जो जनता आपके योग के कारण आपको सर आँखों पे बिठाए रखती थी उसे ही आपका नेता की तरह बोलना भी पसंद न था।
अभी भी समय है इन तथाकथित नेताओं के पास कि वो संभल जाएँ अन्यथा जनता भी समय का इन्तेजार ही करती है। जरुरी है इनके लिए कि वो विकास और धर्म में घुस आयीं तमाम विसंगतियों को दूर करने का प्रयास करें न कि उन विसंगतियों के खिलाफ बोलने वाले को दूर करने का प्रयास करें।