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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

एक मानवीय भूल या पासपोर्ट बनवाने में पुलिस अधिकारियों की चलती मनमानी।

आज फेसबुक खोले ऑफिस में बैठा हुआ था, तभी एक फोटो मेरे एक फेसबुकिए मित्र द्वारा शेयर किया हुआ एक फोटो दिखा, जो रक्सौल की एक लड़की पुष्पम पल्लवी का है। जब फोटो के नीचे लिखा संवाद पढ़ा तो मामला समझ में आया। इस मामले को पढ़ते हुए मुझे अपना समय भी याद आ गया, जब मुझे भी कुछ कारणों से पासपोर्ट बनवाना पड़ा था और जब घर पर पुलिस निरीक्षण के लिए आई थी तो उन्होंने मेरे पिता जी से रुपये (घूस) का मांग किया था। उस समय मैं अपनी अभियांत्रिकी की पढ़ाई पूरी कर रहा था और उस समय मेरे सारे सहपाठियों द्वारा भी पासपोर्ट बनवाया गया था जिसमें सबने कुछ न कुछ घूस दिया था और कुछ दोस्तों ने तो चूँकि पासपोर्ट महाराष्ट्र से बनवाया था तो उन्हें दो-दो बार घूस देनी पड़ गयी थी, एक तो महाराष्ट्र में और एक बार अपने घर पर। और यह एक सामान्य सी प्रक्रिया ही बन गयी थी, जिससे मेरे पिताजी को भी घूस की राशि देनी पड़ी। शायद विरोध करते तो मेरा भी फाइल कुछ इसी तरह का बना दिया जाता और मैं उच्च शिक्षा प्राप्त न कर पाता। और यह घटना कहीं और की नहीं बल्कि रक्सौल की ही है। 
कहने को तो सरकार ने बहुत तरह की व्यवस्था बना दी है कि कोई घूस न लेने पाये, मगर यह न बनाया कि कोई घूस दिये बिना कार्य कैसे करवाए, और मजबूरी में कोई करे तो क्या करें, कौन अपने सर पर बदनामी लेने जाए एक झूठ मूठ के केस का।कहने को तो बहुत कहेंगे कि बिहार के पुलिस वाले घूस खाते है, मगर यह कड़वा सच हरेक जगह लागू होता चाहे वो बिहार हो या महाराष्ट्र। मगर सरकार के नाक के नीचे हो रही इस जालसाजी को कोई न देखने वाला, जबकि खुद हमारे जन सेवक भी इन बातों को अच्छे तरीके से जानते है।
कहने को तो आज भले ही बिहार की यह पुलिस कह रही की मानवीय भूल है, मगर ये मानवीय भूल हो कैसे गयी वो भी पासपोर्ट जैसे अंतराष्ट्रीय महत्व के कागजात जारी करने में, और यह किसी भी दृष्टि से मानवीय भूल तो लगता नहीं है, क्यूँकि हरेक साल न जाने कितने पासपोर्ट इस थाने में आते होंगे, और न जाने उन पासपोर्ट से कितने ही अधिकारियों का पॉकेट गरम होता होगा जिससे सारे पासपोर्ट बिना कोई खास परेशानी के जारी हो जाते होंगे। शायद पल्लवी पुष्पम और उसके पिता जी ने यह भूल कर दी कि उन्होंने पुलिस को कोई घूस न दी। सरकार भी तो हमारी ऐसी ही है, जो इसे पुलिस द्वारा मानवीय भूल मानते ही उस मामले को रफा-दफा करने में लग जाएगी। मगर शायद पल्लवी पुष्पम के लिए प्रति मानहानी का भी जिम्मेदार है, क्यूँकि कहीं न कहीं उसे कई परेशानियों का शिकार होना पड़ेगा जिसमें मानसिक परेशानी भी शामिल होगा। हो सकता है पल्लवी को अपने कार्यक्षेत्र में उन्नति का भी अवसर होगा या फिर कंपनी के किसी आवश्यक कार्य के कारण बाहर जाना होगा, मगर इन सरकारी बाबू को इससे क्या, पासपोर्ट का नाम सामने आते ही उनकी आँखों के आगे हरे-हरे नोट जो दिख जाते होंगे।
शायद इस मानहानि का जिम्मेदार सिर्फ एक पुलिस अधिकारी नहीं बल्कि पूरे देश में हो रहे, पासपोर्ट से संबन्धित कार्य में घूस खा रही हमारी भारतीय पुलिस भी शामिल है।देखते है, एस॰पी॰ साहब ने तो जांच की बात कह दी, मगर यह जांच कब पूरी होगी पता नहीं, शायद इस जांच के बहाने पल्लवी को बार-बार घर बुलाने के लिए परेशान भी किया जाए, आखिर ऐसा होना भी संभव ही लगता है, क्यूँकि ऐसा बार-बार होने पर पल्लवी की भी मजबूरी हो जाएगी या तो वो अपनी नौकरी छोड़ दे या फिर अपनी शिकायत वापस ले ले। और तब जा कर यह जांच पूरी हो पाएँ।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

खुद की जिंदगी में मिठास को तरसते किसान

चम्पारण एक ऐसा जगह जो ना जाने कितने मुख में अपनी मिठास बाँटती होगी, चाहे वो वहाँ की जलेबी में भरे रस से हो या फिर आपके थाली में पड़े खीर के ही माध्यम से । ऐसा मैं इसलिए भी कह पा रहा हूँ क्योंकि यहाँ गन्ने के किसान बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती करते है जो यहाँ के चीनी मिलों में चीनी बनाने के लिए प्रयोग की जाती और यह चीनी मालूम न कितनों की थाली की मिठास बढ़ाती होगी। सिर्फ यहीं तक नहीं हमारे यहाँ होने वाले पर्व-त्यौहार  और शादी वगैरह भी तो है जो ना जाने कितनों को एक दूसरे से मिलाती, नए रिश्तों को आगे बढ़ाती है और अपनी खुशियाँ जाहिर करने का मौका भी देती है।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं उसी चम्पारण की जिसका एक प्रमुख फसल गन्ना भी है। मगर अफसोस तो तब होता है जब इन्हीं मिठास भरने वाले किसानों की थाली में दो वक़्त खाने को नसीब न हो, वो भी ऐसे जगह पर जहाँ बड़ी मात्रा में चीनी मिल भी लगे हुए हैं जिसमें नामी गिरामी सार्वजनिक उद्यम हिंदुस्तान पेट्रोलियम के भी संयंत्र है। शायद आप सोच रहे होंगे की उस क्षेत्र में किसानों की फसल खराब हो गयी हो। तो आपका शक अभी दूर कर दिए करते है, ये किसान तो मारे हुए है सरकारी योजनाओं एवं हिन्दुस्तान पेट्रोलियम के इन संयंत्रों के।
कहने को तो सरकार ने पुराने चीनी मिल चालु करवा कर गन्ना के किसानों को राहत प्रदान की है, सरकार द्वारा दिखाए जाने वाले आंकड़े कुछ ऐसा ही कहते है जिसके बल पर हम यह भी कहते है की हमारे सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है। मगर शायद हकीकत तो इसके कोसों दूर है। इस साल तो इन किसानों ने इन चीनी मिल की बदौलत गन्ने की खेती ही बंद कर दी। अब शायद आप फिर यह न सोचे की मिल बंद हो गया या फिर हमारे किसान पिछले फसल से बहुत ज्यादा कमा लिए होंगे, जी नहीं यह आपकी गलतफहमी होगी।
सरकार ने कहने को तो इस सार्वजनिक क्षेत्र की उद्यम के माध्यम से चीनी मिल चालू भी करवा दी, गन्ने भी ले लिए और उससे चीनी भी निकल गयी। मगर जब बात आयी किसानों को भुगतान करने की तब यह चीनी मिल यह कहता है कि आप भुगतान की राशि का चीनी ले जाओ मगर भुगतान नहीं मिलेगा। क्या हमारे किसानों ने इसीलिए गन्ने की खेती की थी कि उसे फिर चीनी को किसी साहूकार के यहाँ बेचना पड़े और उसके पीछे समय और पैसा दोनों गवाएँ, और फिर उस चीनी को तो वो क्या उसके परिवार वाले भी अकेले न खा सकते है, या इसलिए कि वो उस भुगतान राशि से प्राप्त आय से अपनी जिंदगी को चलाने के लिए रोजमर्रा के सामान खरीद सके और अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा सके। मगर शायद इन चीनी मिल को चलाने वाले सरकार से उच्च आय प्राप्त अधिकारियों को इससे क्या मतलब, वो तो सिर्फ अपनी ही समझते हैं और अपने स्वप्न में व्यस्त रहते। शायद इन सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम के सरकारी मालिकों ने यह नहीं सोचा था कि चीनी उत्पादन करना ही उनकी जिम्मेदारी नहीं बल्कि बाजार में उसे बेचना भी उनकी जिम्मेदारी हैं, मगर उन्हें बोलने जाये तो कौन, वो तो सरकारी आदमी है। शायद वो यह नहीं समझते की जिन किसानों ने फसल उनको दिया उसकी हरेक आह उसे ही लग रही है। शायद हमारे बिहार सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार है जिसने चीनी मिलों को खुलवा तो दिया, मगर उस सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रम से कभी न पूछा कि चीनी की खपत का क्या, यह कभी नहीं देखा कि किसान को अभी तक भुगतान हुआ या नहीं या क्या कारण है जो इस क्षेत्र के किसान जो कभी गन्ने की खेती पर निर्भर थे उनके खेत खाली पड़े हुए हैं और वो मजदूरी कर रहे। मालुम न कब हमारे किसान भाई इस सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के महामहिमों से अपने हित की कुछ सोच पाएँ।
मैंने सोचा हमारी तथाकथित लोकतंत्र के पांचवें खम्भे के रूप में जाने जानी वाली मीडिया भी इस विषय को छेड़ती मगर उसे विकास या मुलभुत परेशानियों से क्या मतलब वो तो सिर्फ टी.आर.पी. के पीछे पड़ी रहती। उसे इससे क्या मतलब जो मिठाई उसकी थाली में है उसकी मिठास किसी ऐसे ही किसान के खेत से आई है, उसे तो सिर्फ सनसनी पैदा करने वाले खबरों से मतलब है।
शायद हमारी सरकार, मीडिया और ये तथाकथित सार्वजनिक क्षेत्र के महामहिम कब जागेंगे, शायद जब तक वो जागे काफी देर हो चुकी हो और कर्ज चुकाने के लिए हमारे किसान भाइयों की जमीन बिक्री को तैयार हो।