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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

सुशासन बाबू हम भी बिहार में है...

19 September 2012, आज हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री जी हमारे जिला में आए थे| मगर नजर शायद कहीं और थी, हुंकार तो खूब भरी आपने मगर हमारी चिंता भी ना की| कहने को तो ये अधिकार यात्रा थी मगर शायद बहुत सारे अधिकारों से मुख्यमंत्री जी ने ही हमे अलग किया हुआ है|
हमारे मुख्यमंत्री जी आए तो थे चंपारण में मगर आगे के दरवाजे से नहीं पीछे के दरवाजे से, आए थे तो सरकार के नाम पर मगर एनडीए के प्रतिनिधि नहीं अपने पार्टी के प्रतिनिधि बन कर| मुख्यमंत्रीजी से तो पहले अपेक्षा यह थी की वो हवाई मार्ग से आएंगे हमें भी हेलीकाप्टर देखने को मिलेगा मगर वो इस धरती पर आए भी तो सड़क से। चलिये कोई बात नहीं, हम ये भी इनसे अपेक्षा किए थे की वो आएंगे हमारे मुख्यमार्ग से हो कर मगर वो आए पीछे के मार्ग से|
आखिर मुख्यमंत्री जी आप इस तरह से क्यूँ आए हमारे जिला में, कम से कम आपके आने से हमारे सड़क तो ठीक हो जाते जो आप लोगो की रहमो-करम का इंतेजार कर रही है| कम से कम हमारे जिला के लोग ये देख कर खुश हो जाते की चलो कुछ तो काम हुआ भले ही वो क्षणिक ही क्यूँ ना हो। मुख्यमंत्रीजी हमें आपसे ये अपेक्षा ना थी की आप मुह छिपा कर पिछले दरवाजे से आयेंगे | मुख्यमंत्रीजी कृपया कर कभी आगे का दरवाजा भी उपयोग में लाये जिससे आपको भी मालूम हो, की यहाँ के जनता को और क्या परेशानी हैं, और क्या सुधार किया जा सकता है, आपके एनडीए के सांसद हमारे लिए क्या कर रहे| कहीं हम खुद को अलग तो महसूस नहीं कर रहें|
 मुख्यमंत्री जी, हमारे बेतिया में एक हॉस्पिटल है, कहिए कम से कम आपके आने से उसकी सूरत थोड़ी तो ठीक हो गयी नहीं तो उसकी कोई पूछ लेने वाला नहीं था, मुख्यमंत्री जी ये वही हॉस्पिटल है जिसको मेडिकल कॉलेज बनाने का आप सपना भी देखे हुए है, मगर यहाँ के डॉक्टर लगता नहीं कभी आपके सपने को साकार भी होने देंगे| आखिर होने भी कैसे दे सकते है, जब भी आपको फुर्सत मिले यहाँ हॉस्पिटल के आस-पास घूम लीजिये, मरीज हॉस्पिटल में कम, प्राइवेट क्लीनिक में ज्यादा दिखते है, मालूम नहीं ये टैक्स भी पूरा भरते है या नहीं|

मुख्यमंत्रीजी, आप रमना आ कर तो चले गए, मगर शायद आप यहा की गलियों में घूमना भूल गए जिससे मालूम चले यहाँ प्रशासन बिजली के खंभो पर कौन सा खेल, खेल रहा हैं|

मुख्यमंत्री जी, आप आए थे तो चंपारण में, मगर शायद आप इसके अधिकतर इलाको को घूमना भूल गए| यहाँ एक रक्सौल जगह भी है जिसका प्रस्ताव आपने नए जिला के तौर पर रखा है| यहाँ कॉलेज तो हैं, मगर पढ़ने ओर पढ़ाने वाले नदारद|
यहाँ सड़क तो है मगर उसपर गाड़ी के चक्के की जगह बारिश का पानी नजर आता है| पत्थर की जगह यहाँ सड़क में तालाब नजर आता है|
प्रशासन की जगह सड़क पर खुले जानवर नजर आते है| मुख्यमंत्री जी, हमारे लोगों को ये जानवर भी प्रशासन की भांति ही नजर आता है, मालूम ना कब हमें सींग मार दे|

मुख्यमंत्री जी, गुस्ताखी हो गयी, हमें तो अब याद आया, आप हमारे तरफ आ भी कैसे सकते थे, आपने जिसे सड़क बनाने को बोला है, उसने तो कुछ किया ही नहीं| चलिये आपकी ये भी दलील मान लेते है की वो केंद्र सरकार की सड़क है, मगर आपके सांसद भी तो दिल्ली में बैठ कर आराम फरमा रहे है, कम से कम वो तो कुछ कर सकते है हमे इस समस्या से निजात दिलाने की जैसे बिहार के दूसरे जगहो पर हुई है|

मुख्यमंत्री जी, आप जब भी हमारे यहाँ आए आपका स्वागत है, मगर आप रेल मार्ग की तरह आए जो अपने सफर में अधिकतम जगहों को मिलाने की बात करती है| मुख्यमंत्री जी आपके सामने एक यात्रा मार्ग रखना चाहूँगा जिससे आप चंपारण के अधिकतम हिस्सो तक पाहुच सके|
मुख्यमंत्रीजी अगली बार आप जब भी आए तो पिछले दरवाजे नहीं बल्कि मुख्यमार्ग से आए| आप मुजफ्फरपुर होते हुए पिपरा होते हुए मोतीहारी में प्रवेश करे, फिर वहाँ से आप आदापुर मार्ग को पकड़े, फिर आप आदापुर होते हुए रक्सौल में प्रवेश करे| इस रक्सौल से निकालने के लिए पुनः उल्टे रास्ते ना जाए, जो आपके मुलाज़िम बताते हो|
बल्कि वहाँ से सुगौली हो कर छपवा होते हुए बेतिया जाए| फिर बेतिया से आप अरेराज मार्ग होते हुए आप चंपारण से प्रस्थान कर सकते है| आशा है आप हम चंपारणवासियों की व्यथा को समझते हुए, आप पीछे की मार्ग के बजाय आगे के मुख्यपथ से आयेंगे|
वैसे भी, पीछे के मार्ग से चोर-उच्चके ही आते है वो भी नजर बचा कर|

Road of Raxaul

Road of Raxaul

Road of Raxaul
 

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश : क्या हमारे लिए सही में लाभदायक है???

आज देश के सामने कोयला और अन्य घोटाला जैसे थोरीयम घोटाला को छिपाने के लिए जैसे डीजल, रसोई गैस और विदेशी निवेश का बॉम्ब फोड़ा गया है| बहुत सारे जानकार यह कहने से नहीं चूक रहे इससे रोजगार का अवसर प्रतस्त होगा, मगर आकड़ों के आधार पर नहीं बताना चाहते| उनका कहना है संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे मगर असंगठित क्षेत्र का क्या होगा इसकी कोई चिंता नहीं| FICCI जो की हमारे देश के बड़े व्यापारियो जैसे टाटा, बिरला वगैरह का प्रतिनिधित्व करती है उसका भी यही कहना है कारण आज के समय में जहाँ हरेक कंपनी के बीच मुनाफा कमाने की होड़ सी लगी है, आज कौन सी कंपनी है जो गरीबों की सुनती हैं, शायद कोई नहीं| जहाँ एक तरफ सरकार कहती हैं की अगले 10 साल में भारत में करोड़ो की तादाद में रोजगार उपलब्ध होगा तो वो भी किस आधार पर ऐसा कह रहे है मालूम नहीं| आज जो सरकार विदेशी निवेश के पीछे है उसी सरकार मे सम्मिलित मनमोहन सिंह जी ने एक समय एनडीए सरकार को विदेशी निवेश के लिए मना भी किया था, मगर मालूम नहीं आज सोनिया गांधी के अमेरिका प्रवास से आते ही क्या हो गया की बिना सहयोगी दलों की सहमति से आज विदेशी निवेश को लागू भी कर गए, जो हमेशा करप्शन जैसे मुद्दे पर सहयोगी दलो के असहयोग की बात करते हैं|

फिर भी आइए देखे हम आम जनता का क्या फायदा है विदेशी निवेश से और दूसरे जो इसे रिफॉर्म का नाम देते है उन्हे क्या फायदा है???
1। जनता को पहला फायदा है समान सस्ते मिलेंगे, यह अल्प-कालीन दृष्टि से देखा जाये तो अच्छा दिखता है| मगर इसके दीर्घ-कालीन दृष्टि से भी देखना जरूरी है| आज सरकार कह रही है की वो प्रतियोगिता के कारण समान सस्ते में बेचेंगे, मगर कौन जानता है, बाद में उनके सामान महंगे हो जाए उदाहरण के लिए मैं पुणे (महाराष्ट्र) की बात करूंगा जहां BIG BAZAAR के दो दुकानों का समान बेचने का तरीका अलग अलग है,  एक तरफ हाई-क्लास सोसाइटी वाले जगह पर वो MRP पर समान बेचते हाई, वही दूसरे जगह डिस्काउंट पर, इन दुकानों में कृषि उत्पाद के मूल्य में भी अच्छा फर्क हैं।
मैं पुणे का एक और उदाहरण लूँगा जिसमे पहले Big BAZAAR ने अपने समान को सस्ते मे बेचना चालू किया नतीजा उसके ग्राहक बढ़ गए और जनरल स्टोर-किराना की ग्राहक कम हो गए| बाद में इस स्टोर ने अपने दामो में धीरे धीरे फर्क लाकर महंगे दरो में बेचना चालू कर दिया, परिणाम स्वरूप ग्राहक को असली दर तो मालूम नहीं वो अब वो महंगे दामो पर अपना सामान खरीद रहे हैं, यहा तक की वो Carrybag का दाम भी अपने पॉकेट से दे रहे|

2। रोजगार बढ़ेगा,दिखने में तो यह रोजगार शब्द बहुत लुभावना लगता है| आखिर हो भी क्यूँ ना, बेरोजगारो की संख्या भारत मे कम थोड़े ही हैं| मगर सरकार को स्व-रोजगार बढ़ाने के जगह यह उपाय ही ज्यादा अच्छा लगता है जिसमे हमारे अधिकतर युवा सेल्समैन ही बन कर रह जाए, क्यूकी मालिकाना हक या उच्च पद तो विदेशिओ के पास ही होंगे ना| चलिये कुछ समय के लिए ये भी मान लिया जाए की बेरोजगारी से बढ़िया कुछ तो सही, तो फिर सरकार जिस संख्या मे रोजगार मतलब 10 सालों मे करोड़ो की बात करती वो कहाँ तक सही है जबकि वाल-मार्ट मे अभी फिलहाल 2,100,000 कर्मचारी है वो भी  3400 रीटेल स्टोर होते हुए| तो क्या भारत जैसे जगह पर यह आसान है की वो 10-15 साल में 20 लाख भी जॉब दे पाएगा (बाकी की संख्या अन्य आने वाले कंपनी पर निर्भर करती है)| यह रोजगार पाने की बात है तो अब रोजगार खत्म होने की बात, वाल मार्ट जैसी कंपनी अपना समान बड़े उत्पादको से खरीदती है जिससे उनका खर्चा कम बैठे, और भारत में अधिकतर किसान छोटे जोत के है| क्या वाल-मार्ट ऐसे किसानो से भी कृषि-उत्पाद खरीदेगी? फिर असंगठित क्षेत्र में सरकार बात करती है फूड-सप्लाइ चेन की, जिसमे वो कहती है की किराना दुकान जैसे असंगठित क्षत्र के लोगो को भी फायदा होगा, यह तो पहली बार सुना है कोई कंपनी इनफ्रास्ट्रक्चर खुद के लिए बनाए और उपयोग किसी और को करने दे|
लिंक: http://walmart1percent.org/top-reasons-the-walton-family-and-walmart-are-not-job-creators/

3। भारत में विदेशी मुद्रा आएगी| सरकार की ये भी बात सही है की देश मे विदेशी मुद्रा आएगी, मगर सरकार पे जिस प्रकार भ्रस्टाचार के आरोप लग रहे है, क्या यह मुमकिन नहीं ये पैसा देश का ही हो जो विदेश में काले धन के रूप में जमा किया गया हो, और उसे वहाँ निवेश कर यहाँ लाने की कोशिश हो| मतलब काले-धन को सफ़ेद में बदलने की प्रक्रिया| फिर क्या यह संभव नहीं, मुद्रा-हस्तांतरण से संबन्धित नियमो जैसे फेमा को अंगूठा दिखाने की कोशिश हो| इस विदेशी मुद्रा के आगमन का बहुत सारे भारत की कंपनीय भी इंतेजार कर रही, कही ये उनके विदेश में कमाए पैसे तो नहीं जो वो नियमों के तहत ला नहीं पा रहे हो?

4। कहा जा रहा है, ये कंपनी इनफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने मे मदद करेगी, मगर किसके लिए? ये सवाल किसी ने नहीं पूछा? पहले तो ये सरकार से कई तरह की छुट लेंगी जैसे जमीन के दाम में, ट्रांसपोर्ट में, बिजली में, ईंधन में इत्यादि फिर उस पर वो अपना व्यापार करेंगी, मतलब आम जनता टैक्स देगी और कंपनी मजे करेंगी|
लिंक: http://www.walmartsubsidywatch.org/
http://www.chauthiduniya.com/2012/09/amended-land-acquisition-bill-black-law-black-straight.html

5। फिर बात आती है Patent की, भारत के कृषि उत्पादो को विदेश मे पैटंट कराने की बात कोई नयी नहीं है, जब ये कंपनी भारत मे आएंगी तो उनका ध्यान यहाँ के ऐसे उत्पाद पर होगा जिसका व्यापारिक मूल्य बहुत ज्यादा होगा, तो ये कंपनी वैसे वस्तु जैसे बीज, पौधे वगैरह का पैटंट भी करवायेंगी, नतीजा भविष्य में इन कंपनी को छोड़ कोई भी उस वस्तु का उत्पादन नहीं कर पाएगा|
 यहाँ तक की भारत मैं सीड-जीन बैंक है जिसमे घोटालो की बात उठती रहती है, कौन जाने भविष्य में यह बैंक इन कंपनी को बेच दिया जाए जो भारत के कर-दाताओ की बदौलत हैऔर बाद में हमारे किसान ही इसका उपयोग ना कर पाये|
लिंक: http://www.chauthiduniya.com/2012/09/india-seed-gene-bank-scam.html

6। हमारे यहा के दुकानों या बिज़नस को 12% के हिसाब से लोन दिया जाता है वही विदेशी कंपनी को 4% की हिसाब से, तो प्रतियोगिता तो यही खत्म हो जाएगी, जब यहाँ के लोकल किराना उनके सामने ना टिक पाएंगे|

कुछ और लिंक:
1। http://www.ideasmakemarket.com/2011/11/why-fdi-in-retail-is-bad-for-india.html
2। http://www.moneylife.in/article/100-fdi-in-retail-in-india-good-or-bad/21733.html
3। http://sanjaykaul.wordpress.com/2011/12/02/10-reasons-why-fdi-in-retail-is-a-bad-idea/
4। http://intellibriefs.blogspot.in/2011/12/why-fdi-in-retail-is-bad-swamys-quote.html
5। http://expertscolumn.com/content/reasons-why-should-we-oppose-fdi-retail-big-no-fdi-retail
6। http://www.indiafdiwatch.org/index.php?id=76
7। http://www.firstpost.com/business/retail-fdi-are-merits-overhyped-145568.html
8। http://rtn.asia/1034_fdi-indian-retail-bad-idea-uni-global-union
9। http://www.ibtl.in/video/6502/walmart-the-high-cost-of-low-prices-full-movie
10। http://www.ibtl.in/video/6501/the-high-cost-of-low-price--why-walmart-stores
11। http://www.pbs.org/wgbh/pages/frontline/shows/walmart/secrets/stats.html

थोरीयम घोटाला
http://www.firstpost.com/india/after-coal-did-india-give-away-thorium-at-pittance-too-441078.html ,
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-06-27/india/32440058_1_thorium-nuclear-reactor-kudankulam,
http://thestatesman.net/index.php?option=com_content&view=article&id=421905&catid=38Special

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

चम्पारण: क्या हम भारत में है?

चम्पारण का मतलब चम्पा के फूलों का जंगल होता हैं॰ यह फूल अपने सुगंध के लिए जाना जाता है| मगर वही चम्पारण शायद अपनी धरती का सुगंध दूसरों को देते-देते खुद का सुगंध खो चुका है| चम्पारण की इस धरती पर का महत्व ऐसे ही समझा जा सकता है कि यह धरती चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे शासक, चाणक्य जैसे राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री, महात्मा गांधी को प्रेरणा देती रही है(ज्ञात हो की चम्पारण में ही चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म हुआ था, चाणक्य का किला है, गांधीजी की कर्मभूमि है)| यह चम्पारण सिर्फ अपनी ऐतिहासिक परिचय ही नहीं बल्कि वो नेपाल राष्ट्र में प्रवेश करने का एक मुख्य मार्ग भी है या दूसरे शब्दों में कहे कि अंतराष्ट्रीय महत्व के लिए भी जाना जाता हैं|
मगर आज के राजनीतिक हालत जिसमें बिहार में एक तरफ सुशासन का नारा है दूसरी तरफ केंद्र में गांधीजी के तथाकथित अनुयायी हैं, वहाँ चम्पारण को पूछने वाला कोई नहीं हैं| आज के समय में जहां बिहार की अधिकतम सड़कों का कार्य अच्छे तरीके से हुआ है, वही चम्पारण अभी भी सड़क बनने की राह देख रहा है| जब कोई भी आगंतुक सड़क मार्ग से चम्पारण में प्रवेश करता है तो उसे सिर्फ खराब सड़के मिलती है| यहाँ की सड़क की स्वीकृति पहले तो 4-लेन की हुई थी और उसी आधार पर Tatiya Construction Company को सड़क बनाने का ठेका भी दिया गया| शुरुआत में तो कार्य अच्छे तरीके से चल रहा था मगर बाद में ना सिर्फ जगह के महत्व को नकारते हुए केंद्र सरकार द्वारा 4-लेन सड़क को 2-लेन में बादल दिया गया बल्कि Tatiya Construction ने अपना काम भी लगभग रोक दिया| परिणामतः आज बिहार की अधिकतर जनता जहाँ अच्छे सड़क का फायदा उठा रही है वही चम्पारण की जनता आज भी उन्ही टूटे-फूटे सड़क पर चलने को मजबूर है| आज चम्पारण से माननीय सांसद को शायद सड़क की दुर्गति से कोई मतलब नहीं है जैसे की वो इस जगह को जानते भी नहीं हो| दूसरी तरफ यदि हम ऐतिहासिक जगहों की बात करे तो चम्पारण में अधिकतर जगह अभी भी राज्य सरकार की बाँट खोज रही हैं| इस राज्य सरकार की बात करे तो इसमे भारतीय जनता पार्टी भी है जो शायद अपनी संस्कृति से जुडने का दावा करते रहते है, मगर उन्हे चम्पारण की अनेकों अविकसित जगह जैसे चानकीगढ़ (चाणक्य का किला), बावनगढ़ी, लौरिया अशोक स्तम्भ, बेतिया के संग्रहालय और प्राचीन मंदिर भी नहीं दिखते हैं| फलस्वरूप बेतिया संग्रहालय से अनेकों वस्तुएँ, मंदिरो की पुरानी मूर्तियां चोरी होती रहती है (ज्ञात हो पिछले कुछ सालो में बेतिया संग्रहालय से करोड़ो के मूल्य के हीरा की चोरी, वहाँ के घंटा घर में लगे घड़ी के डायल में लगे बहुमूल्य हीरा और धातु भी चोरी हो चुकी है) |यहाँ तक की चम्पारण में ही गांधीजी का आश्रम जिस को नेता लोग कभी कभार उनके जन्म तिथि जैसे समय पर याद कर लेती है भी साल भर उपेच्छित पड़ी रहती है|
चम्पारण के बेतिया में ही हजारीमल धर्मशाला जो की गांधी जी का ठहराव स्थल भी रह चुका है आज टूटा फूटा मौजूद है और उस पर कानूनी केस भी चल रहा है, मगर उसके विवाद को जल्द सुलझा कर उसे सही करने की फिक्र किसी को ना है| मोतीहारी में भी दूसरी तरफ जॉर्ज ऑरवेल का निवास स्थान और गांधीजी से भी जुड़े कई जगह है वो भी आज सरकारी उपेक्षा का शिकार है और स्थानीय लोगो की मेहरबानी पर टिका हुआ हैं|
रक्सौल जो की नेपाल का प्रवेश स्थल भी है वहाँ पर भी यदि सुविधाओ को देखा जाए तो सड़क मार्ग आज तालाब बना हुआ है| पर्यटक सुविधा नगण्य है, जहाँ अंतराष्ट्रीय पर्यटक हमेशा आते रहते हैं परिणाम स्वरूप यह भारत के नाम को भी खराब करता है मगर उसकी चिंता करने वाला कोई नहीं हैं|

आज चम्पारण के सामने एक सवाल खड़ा है क्या वह सही में भारत का एक अंग है? मगर आज भी उसके मन की आशा बलवती है और आज भी चम्पारण अपने तथाकथित नेता रूपी रहनुमाओं का इंतेजार कर रहा की कब उसका वक़्त आएगा की वह पुनः एक मिशाल खड़ी कर सके और धरोहरों पर नाज कर सके और नई पीढ़ी को प्रेरणा दे सके|

हक के लिए आम आदमी का हक छीनते गरीबो के तथाकथित हमदर्द राजनैतिक पार्टियां




रामगढ़वा, 12 सितंबर| आज के दिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक रूप से परिचय हुआ| ये परिचय एक गरीब के हमदर्द के रूप मे कम बल्कि आम जनता और यातायात सुविधा को भंग करना ज्यादा लगा| आज यहाँ पार्टी के कार्यकर्ता नेशनल हाइवे को अपनी कुछ मांग को लेकर जाम किए हुए थे| उनकी मांग तो जायज थी मगर अपनाया गया तरीका नहीं| वहाँ जब लोगो से पूछा गया तो बताया गया की तथाकथित जरीबों ओर मजदूरो के हक के लिए संघर्ष करने वाले नेता जी का भसान चल रहा था और पुलिस जीप बगल में लगी हुई थी| जब मालूम किया गया तो ये पता चला नेता जी को गरीबों का ध्यान कम बल्कि मीडिया बाइट की ज्यादा चिंता थी| मीडिया के लोगो के जाते ही नेताजी ने मंच छोड़ किसी और को मंच दे दिया| दूसरी तरफ इस जाम के कारण दोनों तरफ के रोड पर जाम लगाना चालू हो गया| जानकारी के लिए मालूम हो की ये रोड नेपाल के लिए सप्लाइ लिंक का काम करता है| जिसके कारण कई किलोमीटर तक बस और ट्रक जाम मे फस गए थे| यहा तक की जाम का उद्देश्य आम जनता को परेशान करना ज्यादा लग रहा था ना की अपनी मांगो को मनवाना क्यूकि वहाँ के अधिकारिओ से संपर्क स्थापित करने की कोसिस पर मालूम चला राज्य के अधिकारियो का प्रसाशनिक सेवा से संबन्धित सम्मेलन चल रहा था और वो आने मे असमर्थ थे| ये जानते हुए भी नेता जी ने सड़क जाम की| कहने को ये पार्टी तो मजदूरो की पार्टी भी है जिसमे ट्रक, बस, टेम्पो इत्यादि चालक भी आते है मगर उन्हे उनसे और उनके रोजगार से कोई मतलब नहीं| जहां तक इस तरह के धरने का उपायुक्त जगह कोई प्रसाशनिक जगह या कोई मैदान होना चाहिए जिससे की आम जनता को कोई कष्ट ना हो और साथ मे उन्हे भी प्रसाशन द्वारा सुना जा सके| यहाँ तक की जो नेता हक के लिए लड़ते है उनसे कुछ सवाल मेरे इस प्रकार है:
1। क्या उन्होने किसी प्रकार की अनियमितता पर शिकायत दर्ज कारवाई?
2। क्या उन्होने शिकायत लिखित तौर पे दिया था?
3। क्या यह जायज है की एक मांग को लेकर पूरी आम जनता को परेसान किया जाए?
4। क्या यह जायज है की जाम मे ट्रक वगैरह को रोक कर राजकोष को घाटा पहुचाया जाए? क्यूँ ना इस घाटे की भरपाई नेताजी के पैकेट से किया जाए?

आज मैं जिस बस से आ रहा था उसके ड्राईवर से बात करने पर मालूम चला उसे वापस रात को गाड़ी लेकर निकलना है और उसे अब सोने का समय नहीं मिलेगा क्यूँ की जाम लंबे देर तक लगने वाली थी|
ये कहाँ तक जायज है की अपनी मांगो को लेकर दूसरे की जान खतरे मे डाली जाए? क्या पार्टी के तथाकथित गणमान्य नेताजी को उस ड्राईवर रूपी मजदूर की चिंता नहीं साता रही थी जिसके बल पर वो नेतागिरी करते है?
देश की पार्टियों के तथाकथित नेतागण से अनुरोध है की सड़क मार्ग जैसे जगह को अपनी अभिव्यक्ति जाहीर करने का जगह ना बनाए, ये आपके और आपके पार्टी के लोकप्रियता के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है और आम जनता के लिए कष्टकर भी|

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

प्रोन्नति में आरक्षण : क्या सरकारी कंपनियो को सस्ते दाम में बेचने की तैयारी हैं?


एक तरफ प्राइवेट कंपनी में कार्य और शिक्षा को आधार मान कर प्रोन्नति दी जाती हैं, वही भारत की सरकार द्वारा जाति आधारित प्रोन्नति की तैयारी की जा रही हैं|  सरकार की मंशा निचले जातियो के लोगों को उनका अधिकार दिलाना है जिससे वो अग्रणी जातियो की बराबरी में आ सके| सरकार की प्रोन्नति का यह नियम सायद समानता क अधिकार क खिलाफ भी है जिसमे एक जाती विषेश के लोगों को प्रोन्नति मे आरक्षण दी जा रही है और अन्य जाति के लोगों को नीचता का एहसास दिलाया जाए| यह कदम सामाजिक समरसता के लिए और कार्यस्थली पर सहयोग की भावना के लिए भी नुकसान देह है| एक तरफ अल्पसंख्यखों क अधिकार के लिए तो आयोग है मगर बहुसंख्यखों के अधिकार के लिए कोई आयोग गठित नहीं की जाती| प्रोन्नति मे आरक्षण पाये लोग यदि निरंकुश हो गए तो उनके खिलाफ भी उच्च वर्ग के लोग ना जा सकेंगे क्यूकि आयोग और शासन की भाषा सभी जानते है जिसमे कई बार झूठी शिकायते भी की जाती हैं और उच्च वर्ग को उसका फल भुगतना पड़ता है| जहा तक कार्यस्थली की बात है, वहा दो वर्ग के लोग पैदा होंगे:  एक उच्च वर्ग के लोग जो कार्य मे ज्यादा निपुण होंगे और कंपनियों के कार्यो का अधिक अच्छे तरीके से निसपादन करेंगे और दूसरे निम्न वर्ग जिन्हे हरेक कार्य में आरक्षण दिखाई देगा और वो कम निपुण होंगे | ये दूसरे वर्ग के लोग कम अवधि की विशेषज्ञता के बावजूद भी ऊचे पद पर होंगे जहाँ विशेसज्ञता की बेहद आवश्यकता होती| इस विशेसज्ञता की कमी के कारण निःसंदेह घाटा लगना ही है| और आज कल जहां सिर्फ घोटाले की बात हो रही और सरकारी कंपनियो की अक्षमता के आधार पर विनिवेश की बात हो रही तो आज की कमाऊ कंपनी भी कुछ समय बाद उनही श्रेणी मे आ जाएगी| फिर सरकार वैसे कंपनिओ के विनिवेश की बात करेगी| विनिवेश मे ये सर्व विदित है की कंपनी के भाव बाजार के हिसाब से लगते हैं| कही प्रोन्नति मे आरक्षण उस विनिवेश के करीब तो हमे नहीं ले जा रही जिसमे आज की सरकारी कंपनियो के ऊपर प्राइवेट कंपनी राज करेंगी और उनका मकसद जन कल्याण की बजाय मुनाफा कमाना होगा| यहाँ तक इन सरकारी कंपनियो के पास भू-सम्पदा भी अच्छी ख़ासी होती है जिसका मूल्यांकन उनके वर्तमान बाजार के भाव से तय होती है ना की वर्तमान जमीन के मूल्य से, इस तरह इन कंपनी को एक तरफ ना केवल सस्ते दामो में एक कंपनी मिल जाती बल्कि वो एक अच्छी-खासी भू-सम्पदा की मालिक भी हो जाती| वर्तमान कोयला घोटाले मे आए नाम जैसे SKS Steel, Jindal Steel & Power इत्यादि जो कॉर्पोरेट वर्ल्ड (प्राइवेट कंपनी) से जुड़े है और साथ मे सरकार से भी जुड़े है तो ऐसे हालत मे किसी भी प्राइवेट कंपनी में कार्य करने वाले की एक ही लक्ष्य कंपनी को फायदा पाहुचना ही होता है के लिए काम करते नजर आते है ना की देश के लिए| तो ऐसे हालत में मुझे नहीं लगता वो सरकारी कंपनी के विकास की बात करेंगे जो उनकी एक बहुत बड़ी प्रतिस्पर्धी हैं| उनका एकमेव लक्ष्य इन कंपनी को नुकसान पहुचाना होता है जिससे वो अधिक से अधिक मार्केट शेयर को पा सके जैसा कोयला घोटाले मे Coal India Ltd को Mozambic में खनन करने को बोल कर किया गया और यहाँ की खदान को प्राइवेट हाथो मे दे दिया गया|
एक तरह से कहे तो प्रोन्नति मे सरकार द्वारा उठाया गया कदम जिस पर आज देश के कुछ प्रतिशत लोग भले ही खुश हो, हमारे ही सर पर कील मारने जैसा है जिसमे ना सिर्फ हमे भविष्य में मूलभूत सुविधा के लिए प्राइवेट कंपनी के ऊपर निर्भर होना होगा वो भी उच्चे दामो में वो भी चंद दिनो की खुशी की बदौलत |